Spiritual Study


Spiritual Study

Spirituality का अभ्यास

बुद्धि के द्वारा कुछ जान लेना और बात है, पर Spiritual Study अभ्यास द्वारा अमली तौर पर अपनी रूहानी अवस्था बदलना, बिलकुल अलग बात है। Spirituality को कुछ जानने का नहीं, कुछ करने या बनने का मार्ग कहा गया है।

Spirituality का आरम्भ कुछ जानने से होता है। पूर्ण सन्तों के सत्संग में जीव को संसार और शरीर की असलियत का पता चलता है, आत्मा और परमात्मा के आपसी रिश्ते का ज्ञान होता है और आत्मा को परमात्मा में अभेद करने की युक्ति का पता चलता है। जब जीव सतगुरु द्वारा बताई हुई युक्ति के मुताबिक़ Spirituality का अभ्यास करता है तो उसकी अवस्था बदलती है, उसका रूहानी सफ़र तय होता है और वह एक दिन प्रभु-प्राप्ति की मंजिल पर पहुँच जाता है। इस प्रकार जो सफ़र कुछ जानने से शुरू हुआ था, कुछ बन जाने में बदल जाता है।

साईं बुल्लेशाह ने 'हुण मैं हो गई नी कुझ होर' (फ़क़ीर मुहम्मद, कुल्लियात,) द्वारा यह बात समझाने का प्रयत्न किया है कि मुर्शिद के उपदेश पर अमल करने से मेरी हालत बिलकुल बदल गई।

Spirituality में तन, मन और धन की सेवा पर बल दिया जाता है। ये तीनों प्रकार की सेवा, सुरत-शब्द की सेवा यानी Meditation के अभ्यास में सहायता करती है। सेवा का उद्देश्य मन के बरतन को साफ़ करना है ताकि इसमें नाम का अमृत डाला जा सके। लेकिन सेवा ही Spirituality का अभ्यास नहीं है। कोई दूसरी चीज़ कभी भी Spirituality का अभ्यास का स्थान नहीं ले सकती। बिना अभ्यास के रूहानी तरक्की असम्भव है। जब तक सतगुरु की बताई हुई युक्ति द्वारा Spirituality का अभ्यास नहीं करते, मन और आत्मा की अवस्था नहीं बदल सकती और न ही अन्तर में कुछ प्राप्त हो सकता है। डॉक्टर के बताए हुए परहेज़ का पालन करते हुए दवाई का प्रयोग करने से ही बीमारी दूर हो सकती है। इसी प्रकार सतगुरु से नाम का भेद लेना ही काफ़ी नहीं। मांस, शराब आदि से दूर रहकर हक़-हलाल की कमाई करते हुए और निर्मल रहनी धारण करते हुए प्रतिदिन Meditation को अधिक से अधिक समय देना ज़रूरी है।

स्वामी जी महाराज (राधास्वामी सत्संग) फ़रमाते हैं, 'करनी करो मार मन डालो। इन्द्री रोक दुआरा ॥' (सारबचन संग्रह)।


Spirituality करनी का मार्ग है, बातों का विषय नहीं। इसमें मन को इन्द्रियों के भोगों की ओर से मोड़ना उतना ही ज़रूरी है, जितना अन्तर में नाम से जोड़ना। सन्तों ने कम खाने, कम सोने, कम बोलने और मन को हर पल सिमरन, ध्यान या शब्द-धुन में लीन रखने का उपदेश दिया है।

Spirituality को प्रेम-मार्ग कहा जाता है। जब तक मन में परमात्मा की प्राप्ति का प्रेम-प्यार, शौक़-उत्साह नहीं जागता, Spiritual तरक़्क़ी की आशा नहीं की जा सकती। Meditation को पूरा समय देना भी ज़रूरी है और Meditation प्रेमपूर्वक और लगन से करना भी ज़रूरी है। जब करनी को प्रेम के पंख लगते हैं तो आत्मा सहज ही Spiritual मण्डलों में उड़ान भरने लगती है।


एक कहावत है, 'रंग लागत लागत लागत है, रंग छूटत छूटत छूटत है।' मन की मौजूदा आदतों को बदलकर इसे नई क़िस्म की रहनी के अनुसार ढालने में समय और मेहनत दोनों की ज़रूरत है। संसार के किसी भी काम में एकदम सफलता प्राप्त नहीं होती। Spirituality का अभ्यास की तुलना 'अलूनी सिल चाटने' से की गई है। शुरू में Spirituality का अभ्यास रूखा, बेस्वाद और कठिन प्रतीत होता है, लेकिन धीरे-धीरे मन मान जाता है और Spirituality का अभ्यास में से रस आना शुरू हो जाता है। फिर तरक़्क़ी की रफ़्तार बढ़ जाती है और भजन सहज रूप में जीवन का अटूट अंग बन जाता है।


स्वामी जी महाराज फ़रमाते हैं, 'करनी मेहर संग दोउ चलते। तब फल पूरा चढ़ चढ़ लेते॥' (सारबचन संग्रह)। दया और करनी के दोहरे पंखों के सहारे ही अभ्यासीरूपी पक्षी ऊँचे रूहानी मण्डलों में उड़ान भर सकता है। सतगुरु और नाम की प्राप्ति कुल-मालिक की दया-मेहर से होती है। सतगुरु जीव को नाम का भेद देते समय अपनी ओर से उस पर पूरी दया कर देते हैं। उसके बाद जीव को Spirituality का अभ्यास या करनी द्वारा मंज़िल पर पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिये। संसार की हर प्राप्ति करनी से होती है, सन्तमत में भी बिना करनी के प्राप्ति की आशा रखना अज्ञानता है। जब यह हमारा काम है और हमें ख़ुद ही करना है, तो देर क्यों की जाए!

हर काम वक़्त और ध्यान की माँग करता है। Spirituality में सफलता भी वक़्त और ध्यान की माँग करती है। हम जिस चीज़ की कमी महसूस करते हैं, उसके लिये बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिये भी तैयार हो जाते हैं। जब तक दुनिया को बड़ा और प्रभु को छोटा समझते हैं, कभी भी अभ्यास को पूरा समय और ध्यान नहीं दे सकते। जब परमात्मा की प्राप्ति को जीवन का मूल उद्देश्य मानकर इसकी प्राप्ति के लिये दृढ़तापूर्वक निरन्तर यत्न करते हैं, तो प्रभु की दया से एक दिन अन्दर नाम के साथ लिव जुड़ जाती है, मन में से विषयों-विकारों और वहमों-भ्रमों का अन्धकार दूर हो जाता है, आत्मा-परमात्मा में समा जाती है और मानव-जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाता है। 

Spirituality के अभ्यास के बारे मे कुछ संतो के विचार इस प्रकार है, जिससे हमे Spiritual जीवन बिताने के लिए फायदा होगा।



वाणी 1.चारौ जुग के माहिं जो, करनी ही परधान। गुरु सुकदेवा कहत है, चरनदास उर आन॥ (चरनदास जी की बानी) 2. करनी की गति और है कथनी की औरे। बिन करनी कथनी कथै बक बादी बौरे ॥2 करनी बिन कथनी इसी ज्यों ससि बिन रजनी। बिन सस्तर ज्यों सूरमा भूषन बिन सजनी ॥ ज्यों पंडित कथि कथि भले बैराग सुनावै। आप कुटुंब के फँद पड़े नाहीं सुरझावै॥ बाँझ झुलावै पालना बालक नहिं माहीं। बस्तु बिहीना जानिये जहँ करनी नाहीं॥ बहु डिंभी करनी बिना कथि कथि करि मूए।' संतों कथि करनी करि हरि के सम हूए॥ कहैं गुरू सुकदेव जी चरनदास बिचारौ। करनी रहनी दृढ़ गहौ थोथी कथनी डारौ॥ (चरनदास जी की बानी) 3. बिना सतगुरु बिना करनी। छुटे नहिं खान का फिरना॥ (स्वामी जी, सारबचन संग्रह) 4. तखति सलामु होवै दिनु राती ॥ इहु साचु वडाई गुरमति लिव जाती॥ (गुरु नानक देव, आदि ग्रन्थ) 5. अंम्रित वेला सचु नाउ वडिआई वीचारु । (गुरु नानक देव, आदि ग्रन्थ) 6. पहिला बाबे पाया बखसु दरि पिछोदे फिरि घालि कमाई। रेतु अक्कु आहारु करि रोड़ा की गुर कीअ विछाई। भारी करी तपसिआ वडे भागि हरि सिउ बणि आई। (भाई गुरदास, वारां गिआन रतनावली) 7. एथै जाणै सु जाइ सिआणै॥ होरु फकडु हिंदू मुसलमाणै॥' सभना का दरि लेखा होइ॥ करणी बाझहु तरै न कोइ॥ (गुरु नानक देव, आदि ग्रन्थ) 8. आजु कालि मरि जाईऐ प्राणी हरि जपु जपि रिदै धिआई हे॥ (गुरु नानक देव, आदि ग्रन्थ) 9. सुणि सखीए मिलि उदमु करेहा मनाइ लैहि हरि कतै॥ मानु तिआगि करि भगति ठगउरी मोहह साधू मंतै॥ (गुरु अर्जुन देव, आदि ग्रन्थ) 10. भजन आतुरी कीजिये और बात में देर। और बात में देर जगत में जीवन थोरा। मानुष तन धन जात गोड़ धरि करौ निहोरा। (पलटू साहिब की बानी) 11. स्वाँसो स्वाँस होश कर बौरे। पल पल नाम सुमिरना॥ यहाँ की ग़फ़लत बहुत सतावे। फिर आगे कुछ नहिं बन पड़ना ॥ जो कुछ बने सो अभी बनाओ। फिर का कुछ न भरोसा धरना॥(स्वामी जी, सारबचन संग्रह) 12.सत्तनाम निज औषधी, सतगुरु दई बताय। औषधि खाय रु पथ रहै, ता की बेदन जाय॥(कबीर साखी-संग्रह) 13. मारग चलते जो गिरै, ता को नाहीं दोस। कह कबीर बैठा रहै, ता सिर करड़े कोस॥ (कबीर साखी-संग्रह) 14. पाँच पहर धंधे गया, तीन पहर रहे सोय। एको घड़ी न हरि भजे, मुक्ति कहाँ तें होय॥(कबीर साखी-संग्रह) 15. करो कमाई मेरे भाई, एहो वकत कमावण दा। पौं सतारां पैंदे ने हुण, दाअ न बाज़ी हारन दा। (बुल्लेशाह) 16. राती जागे करे इबादत। राती जागण कुत्ते, तैथों उत्ते। भौकनौं बंद मूल न हुंदे। जा रूड़ी ते सुत्ते, तैथों उत्ते। खसम आपणे दा दर न छड्डदे। भावे वज्जण जुत्ते, तैत्थों उत्ते। बुल्ले शाह कोई वसत विहाज लै।12 नहीं ते बाजी लै गए कुत्ते, तैत्थों उत्ते।(बुल्लेशाह) संतो ने बताये गए इसी मार्ग से हम Spirituality का अभ्यास अच्छी तरह से कर सकते है और मालिक के प्राप्ति के लायक बन सकते है।




 

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