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विज्ञान और अध्यात्म की राह विपरीत नही है लेकिन हमें दोनों को ही देखना चाहिए


वैज्ञानिकों के लिये एक चेतावनी

कुछ आधुनिक वैज्ञानिक दावा करते हैं कि उन्हें परमात्मा में विश्वास नहीं है। वे नीचे दिये गये दो कथन दावे के रूप में प्रस्तुत करते हैं (ये दावों के अतिरिक्त और कुछ नहीं)। उनका विचार है कि एक तो ईश्वर के अस्तित्व के समर्थन में कोई प्रमाण नहीं है और दूसरा-इस ब्रह्मांड के अस्तित्व की व्याख्या के लिये परमात्मा की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं है। नि:संदेह वे आस्था और अंतर्ज्ञान को ज़रा भी महत्त्व नहीं देते। उनके अनुसार विज्ञान में इनका कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार उन्होंने संपूर्ण विषय को बेकार कहकर उसकी उपेक्षा कर दी है।


यह दृष्टिकोण निश्चित रूप से अनुचित और अवैज्ञानिक है। इस सोच के पीछे यह निराधार तर्क है कि परमात्मा का अस्तित्व अज्ञात है और उसे जाना ही नहीं जा सकता। उनके लिये परमात्मा से संबंधित धारणा एक कल्पना से अधिक और कुछ नहीं है। इस विचारधारा की रचना अवैज्ञानिक युग में सृष्टि के रहस्य को समझने के लिये की गयी। ये वैज्ञानिक घोषणा करते हैं कि कोई भी परमात्मा के विषय में कुछ नहीं जान सकता, परंतु मेरा विचार है कि यह अनुमान से अधिक


और कुछ नहीं है जो उनकी अपनी अज्ञानता के कारण है। वैज्ञानिक ऐसा क्यों सोचते हैं कि यदि वे ईश्वर के विषय में कुछ नहीं जानते, तो इस संबंध में कुछ जाना भी नहीं जा सकता? यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है। इस सृष्टि की रचना के बारे में यांत्रिक (Mechanistic) सिद्धांत को माननेवाले ये वैज्ञानिक कहते हैं कि उन्हें अब परमात्मा के अस्तित्व के बारे में किसी सिद्धांत की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिये उनके लिये यह विषय महत्त्वहीन है। वे ईश्वर में विश्वास नहीं रखते; उनके अनुसार ऐसा विश्वास किसी बुजुर्ग का अंधविश्वास है।


यदि परमात्मा का अस्तित्व वाक़ई एक कल्पना होता और इस विषय पर कुछ भी निश्चित रूप से मालूम न होता, फिर हम भी यह मान लेते कि यांत्रिक सिद्धांत का खंडन नहीं किया जा सकता। परंतु सौभाग्य से सतगुरु का ज्ञान अनुमान पर आधारित नहीं है। उन्हें इस विषय का प्रमाणित ज्ञान है जो उतना ही स्पष्ट और वैज्ञानिक है, जितना गणित या भौतिकशास्त्र। यह सही है कि एक जिज्ञासु को इस विषय पर कई परिकल्पनाओं को सिद्ध करना है। मुझे अच्छी तरह याद है जब मेरे गणित के प्रोफ़ेसर ने मुझे 'यूक्लिड' का यह प्रश्न हल करने को दिया: ‘दायें समकोण वाले त्रिभुज की कर्णभुजा पर बना हुआ चौकोर दूसरी दोनों भुजाओं पर बने हुए चौकोरों का कुलजोड़ है, ' इससे पहले कि यह मेरे लिये वास्तविक ज्ञान बने, मुझे इसे हल करके प्रमाणित करना था। सतगुरु की भी यही युक्ति है। वे परमात्मा के विषय में जानते हैं क्योंकि उन्होंने प्रमाणित करके परमात्मा को प्रत्यक्ष देखा है। सतगुरु जानते हैं कि परमात्मा सर्वशक्तिमान् है, जो सबकी सँभाल करता है। उसके मुख्य गुण विवेक, प्रेम और शक्ति हैं।


यह भी समझ लेना चाहिये कि सतगुरुओं का ज्ञान क्रमिक विकास की तरह धीरे-धीरे पैदा नहीं हुआ और न लंबे समय के गहन अध्ययन से इकट्ठा किया गया है। यह पुस्तकालयों में उपलब्ध किताबी ज्ञान नहीं है जिसे विद्यार्थियों ने याद करना है। सतगुरु की पद्धति सबसे अनुपम है। यह ज्ञान व्यक्तिगत प्रयास


और निजी अनुभव पर आधारित है। इसे विभिन्न साधनों द्वारा अर्जित नहीं किया जाता। सतगुरु इसे अपनी चेतना के विस्तार से अर्जित करते हैं। जिसे सतगुरु की वैज्ञानिक विधि का ज्ञान है, वही उन्नत अवस्था और आंतरिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यह तथ्य विज्ञान की इस धारणा को अस्वीकार करता है कि परमात्मा का अस्तित्व एक कोरी कल्पना है। सतगुरु की सहायता से परमात्मा के बारे में सटीक और प्रमाणित ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।


यहाँ एक चेतावनी देना ज़रूरी है। कुछ लोग कह सकते हैं कि सृष्टि की रचना के बारे में परमात्मा के अस्तित्व में विश्वास करने के बजाय वैज्ञानिकों की यांत्रिक (Mechanistic) विचारधारा में विश्वास कर लेना कोई बेहतर सोच नहीं है। यह भी तो सच हो सकता है कि कुछ वैज्ञानिक परमात्मा के विषय में कुछ नहीं जानते और न ही वे इसकी कोई ज़रूरत समझते हैं, पर इसके बावजूद भी कुछ अन्य परमात्मा के बारे में पूर्ण ज्ञान रखते हैं। याद रखें कि सतगुरु कोरी कल्पना नहीं करते। सतगुरु के लिये परमात्मा वैज्ञानिकों द्वारा रचा गया परमात्मा नहीं है और न ही 'वह' धर्मशास्त्र के सिद्धांतों की कोई रचना है। यदि सतगुरु की तरह कुछ और लोग भी यह कहें कि उन्हें परमात्मा के संबंध में प्रमाणित ज्ञान है और यह ज्ञान उतनी ही वैज्ञानिक विधि द्वारा अर्जित किया गया है जैसे कोई भौतिकवादी वैज्ञानिक करता है, तो क्या हम उन्हें उनकी इस उपलब्धि का श्रेय नहीं देंगे? क्या वैज्ञानिक जगत् इतना भी उदार नहीं होगा कि उनकी बात सुने? यदि वैज्ञानिक किसी विषय से परिचित नहीं हैं, तो क्या उस विषय पर उन्हें सावधानी से सोच-विचार नहीं करना चाहिये?


यदि मनुष्य आशा, विश्वास तथा अंतरात्मा की आवाज़ पर थोड़ा खुले मन से विचार करता है, तो इसमें हर्ज ही क्या है ? यदि प्रेम की आवाज़ उसकी आत्मा तक पहुँचती है, तो क्या उसकी बुद्धि उसे सुनने की कोशिश नहीं कर सकती? ऐसा करने से उसका मान-सम्मान तो कम नहीं हो जाएगा। इन सब बातों से दूर, सतगुरु हमें विश्वास दिलाते हैं कि उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान की पूरी जानकारी है। क्या हमें उनकी बात नहीं सुननी चाहिये? यदि कोई वैज्ञानिक कहता है कि उसने दूर अंतरिक्ष में एक नयी आकाशगंगा की खोज की है, तो पूरा विज्ञान जगत् सतर्क होकर इस पर ध्यान देगा। फिर इस महत्त्वपूर्ण विषय के लिये इतनी उपेक्षा क्यों? ज्ञान की खोज में लगे सच्चे जिज्ञासु को दूसरों की बात सुनने के लिये हमेशा उत्सुक और तैयार रहना चाहिये।




 

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