कर्म-सिद्धान्त


Karma Theory

कर्म-सिद्धान्त


संसार के सभी सन्तों-महात्माओं ने कर्म और फल के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। सन्तों-महात्माओं ने संसार को 'कर्म-भूमि' और 'करमा संदड़ा खेतु' (गुरु नानक देव, आदि ग्रन्थ) कहा है। 'करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥' (तुलसीदास, रामचरितमानस) - मृत्यु-लोक से लेकर नरकों-स्वर्गों तक और मनुष्य से लेकर देवी-देवताओं तक सभी जीव कर्म और फल के क़ानून के अधीन बार-बार पैदा होते और मरते हैं और किये हुए कर्मों का फल भोगते हैं। नरक, घोर पापों और स्वर्ग, श्रेष्ठ पुण्यों के भुगतान का साधन है। गुरु नानक साहिब कर्म और फल के बारे में कहते हैं:

"ददै दोसु न देऊ किसै दोसु करंमा आपणिआ॥ जो मै कीआ सो मै पाइआ दोसु न दीजै अवर जना॥" (आदि ग्रन्थ)

परमात्मा को दोष देने के स्थान पर यह समझने का यत्न करना चाहिये कि परमात्मा ने मन-मर्जी से नहीं, हमारे पहले किये हुए कर्मों के आधार पर हमारी क़िस्मत लिखी है। काया के बिना कर्म नहीं और कर्म के बिना काया नहीं। सुख-दु:ख, रिश्ते-नाते, अमीरी-गरीबी, मान-अपमान आदि सबका आधार हमारे अपने पहले किये हुए कर्म हैं। भागवत पुराण में भगवान् कृष्ण ऊधो को उपदेश करते हैं कि जो कीड़ा तू सामने जाता हुआ देख रहा है, यह अपने किये हुए कर्मों के कारण कई बार ब्रह्मा और इन्द्र बन चुका है। महाभारत में आता है कि धृतराष्ट्र अपने एक सौ छः जन्म पहले किये हुए कर्म के कारण अन्धा पैदा हुआ था।

कर्मों को आम तौर पर पुण्यों और पापों में बाँटा जाता है। मन, वचन और कर्म के द्वारा किसी को सुख देना पुण्य है और मन, वचन और कर्म द्वारा किसी को दुःख देना पाप है। मगर पुण्य कभी भी पापों का नाश नहीं कर सकते। पुण्य, पुण्यों के और पाप, पापों के लेखे में जमा होते हैं और दोनों प्रकार के कर्मों के भुगतान के लिये मनुष्य चौरासी का हिस्सा बना रहता है।

कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है - प्रारब्ध, क्रियमान और संचित। प्रारब्ध कर्मः

पिछले जन्मों के आधार पर इस जन्म में भोगने के लिये मिले कर्म, प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं। प्रारब्ध अटल है। 'नाह नाह मिटंत भावनी जो लिखी देवे निरंजना' और 'अनकीए लागे नहीं, कीए ना बिरथा जाय।' कर्म अवतारों को भी भोगने पड़ते हैं। श्री रामचन्द्र जी ने छिपकर बाली को तीर मारा था। जब आपने भगवान् कृष्ण के रूप में अवतार धारण किया, तो बाली ने भील के रूप में आप पर बाण चलाया। केवल परमेश्वर के हुक्म से जीवों के उद्धार के लिये सतलोक से मृत्यु-लोक में उतरे पूर्ण सन्त, कर्मों के बन्धन से मुक्त होते हैं। वे कर्मों के कारण नहीं, सतपुरुष के हुक्म से जीवों के उद्धार के लिये संसार में आते हैं।


गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं: जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए॥ जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ लैनि मिलाए॥ (आदि ग्रन्थ) क्रियमान कर्मः

प्रारब्ध कर्म भुगतते हुए जो नये कर्म करते हैं, उन्हें क्रियमान कर्म कहते हैं। आज के क्रियमान कर्म अगले जन्मों का प्रारब्ध बन जाएँगे।


संचित कर्मः

हम एक जन्म में अनेक कर्म करते हैं, पर बहुत कम कर्मों का फल भोगते हैं, जिस कारण हर जन्म के बिना भोगे कर्म जमा होते रहते हैं। इन्हें संचित कर्म कहा जाता है।

मनुष्य का असली बन्धन उसके कर्म हैं क्योंकि जब तक सारे कर्मों का नाश नहीं होता, आत्मा बन्धन-मुक्त नहीं हो सकती। गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं, 'अनिक करम कीए बहुतेरे ॥ जो कीजै सो बंधनु पैरे॥' (आदि ग्रन्थ, पृ. 1075)। हम मन-मर्जी से जो भी पुण्य और पाप करते हैं, वे सब आत्मा के लिये बन्धनकारी हैं, क्योंकि दोनों तरह के कर्मों का फल भोगने के लिये जीव चौरासी से बँधा रहता है। कर्मों से छुटकारे का एकमात्र साधन पूर्ण सतगुरु की शरण और नाम की कमाई है। जैसे-जैसे जीव सतगुरु के उपदेश के अनुसार अपनी लिव अन्तर में शब्द से जोड़ता है, सुरत पर चढ़ी कर्मों की मैल उतरती जाती है। कर्मों का भण्डार दूसरे रूहानी मण्डल त्रिकुटी में है। जब जीवात्मा नाम के अभ्यास के द्वारा त्रिकुटी को पार कर लेती है, तो इसके सभी कर्मों का नाश हो जाता है। नाम की कमाई द्वारा जीव क्रियमान कर्मों से बचा रहता है, नाम की कमाई द्वारा उसके अन्दर प्रारब्ध को हँसते-हँसते भोगने की शक्ति पैदा होती है और नाम की कमाई द्वारा ही वह संचित कर्मों का भण्डार नष्ट करके परमात्मा से मिलाप के क़ाबिल बन जाता है। वाणी 1. राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल । तिसु विचि धरती थापि रखी धरम साल ॥ तिसु विचि जीअ जुगति के रंग ॥ तिन के नाम अनेक अनंत ॥ करमी करमी होइ वीचारु ॥ सचा आपि सचा दरबारु ॥ (गुरु नानक देव, आदि ग्रन्थ)

2. केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस। केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस । (गुरु नानक देव, आदि ग्रन्थ) 3. कर्म अपरबल भारी भोगू। सब जग जार जबर यह रोगू॥2 बिना कर्म कोइ काया नाहीं। जग बस रहा कर्म के माहीं॥ काया बिना कर्म नहिं होई। कर्म बिना काया नहिं कोई ॥ यह अनादि से रचना भाई। जुगन जुगन ऐसे चलि आई। कर्म भूत सब जग को लागा। यासे बची नहीं कोई जागा॥ कीट पतंग संग सब केरे। तीन लोक अंडा सब घेरे ॥ सात दीप नव खंड कहावे। चौदह लोक कर्म बस गावे ॥ चन्द्र सूर अरु दस औतारा। यह सब बँधे कर्म की जारा॥ अंड खंड ब्रह्मंड लों, लोक सकल जग जाल॥ काल कर्म सिर ऊपरे, जुग जुग फिरत बेहाल ॥ (तुलसी साहिब, रत्न सागर) 4. करम गति टारे नाहिं टरी॥ मुनि बसिष्ट से पंडित ज्ञानी, सोध के लगन धरी। सीता हरन मरन दसरथ को, बन में बिपति परी॥ कहँ वह फंद कहाँ वह पारिध, कहँ वह मिरग चरी।4 सीता को हरि ले गयो रावन, सोने की लंका जरी॥ नीच हाथ हरिचन्द बिकाने, बलि पाताल धरी। कोटि गाय नित पुन्न करत नृग, गिरगिट जोनि परी॥ पाँडव जिन के आपु सारथी, तिन पर बिपति परी। दुरजोधन को गर्ब घटायो, जदु कुल नास करी॥ राहु केतु औ भानु चन्द्रमा, बिधि संजोग परी। कहत कबीर सुनो भाइ साधो, होनी होके रही॥ (कबीर साहिब की शब्दावली)


5.नानक जीअ उपाइ कै लिखि नावै धरमु बहालिआ॥ ओथै सचे ही सचि निबडै चुणि वखि कढे जजमालिआ॥ थाउ न पाइनि कूड़िआर मुह काल्है दोजकि चालिआ॥ तेरै नाइ रते से जिणि गए हारि गए सि ठगण वालिआ॥' लिखि नावै धरमु बहालिआ॥ (गुरु अंगद देव, आदि ग्रन्थ)

 

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