संत तुलसी साहिब का जीवन परिचय/Biography of Saint Tulsi Haheb

संत तुलसी साहिब का जीवन परिचय


तुलसी साहिब उन्नीसवीं शताब्दी के परम संत माने जाते हैं। हालाँकि उन्हें इस संसार से गये हुए कोई ज़्यादा समय नहीं हुआ है, परंतु फिर भी अन्य संतों के समान उनके जीवन से संबंधित, विशेष रूप से उनके आरंभिक जीवन से संबंधित प्रमाणिक जानकारी बहुत कम प्राप्त है। सौभाग्य से उनका उपदेश, उनके द्वारा रचित पुस्तकों के रूप में उपलब्ध है।


तुलसी साहिब के जीवन के संबंध में तीन प्रकार के विवरण मिलते हैं।


1. तुलसी साहिब की रचना रत्न सागर की भूमिका में उनके जीवन के बारे में यह संकेत मिलता है कि वह एक ऊँचे कुल के ब्राह्मण परिवार से संबंध रखते थे। बाल्यावस्था में ही उनके मन में सांसारिक जीवन के प्रति उदासीनता आ गई और वह सब कुछ छोड़कर साधु बन गये। अंत में आप हाथरस में आकर रहने लगे। रत्न सागर में तुलसी साहिब के असली नाम, उनके माता-पिता के नाम और जन्मस्थान के बारे में कुछ भी वर्णन नहीं मिलता।


2. तुलसी साहिब पूना के राजा  के सबसे बड़े सुपुत्र थे, जाति से ब्राह्मण थे और उनका नाम श्याम राव था। उनके पिता ने उनकी इच्छा के विरुद्ध छोटी आयु में ही उनका विवाह लक्ष्मी बाई नाम की कन्या के साथ कर दिया। कुछ समय बाद उनके घर में एक पुत्र ने जन्म लिया। श्याम राव के पिता भी आध्यात्मिक वत्ति के व्यक्ति थे और उनकी इच्छा थी कि वे अपने पुत्र को राजपाट सौंपकर शेष जीवन प्रभु की भक्ति में व्यतीत करें। उधर श्याम राव भी सांसारिक धंधों के प्रति बहुत उदासीन थे, संभवत: इसी कारण वे ताजपोशी के लिये नियत की गई तिथि से एक दिन पहले ही शाही महल से गायब हो गये। तलाश करने पर भी जब वे न मिले तो इनके छोटे भाई को शाही गद्दी सौंप दी गई। इस वर्णन के अनुसार श्याम राव कई वर्षों तक जंगलों, पहाड़ों, कस्बों तथा शहरों में भ्रमण करते रहे और अंत में यू. पी. के हाथरस शहर में आकर रहने लगे तथा शेष जीवन उन्होंने यहीं व्यतीत किया। यही श्याम राव बाद में तुलसी साहिब के नाम से प्रसिद्ध हुए। क्षितिमोहन सेन, रामकुमार वर्मा, पी. डी. बड़थ्वाल और परशुराम चतुर्वेदी सहित अनेक विद्वानों ने रहस्यवाद और रहस्यवादी साहित्य के बारे में खोज करते हुए ऊपर बताये गये दो स्रोतों में से किसी एक के आधार पर तुलसी साहिब के विषय में अपने विचार निश्चित किये हैं।


3. कुछ समय पहले महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध इतिहासकार श्री विट्ठल आर. ठक्कर ने पेशवा वंश के अभिलेख के आधार पर इस वंश के संबंध में शोध किया। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि तुलसी साहिब नामक महात्मा पेशवा वंश में से ही थे और उनका जन्म सन् 1763-64 में हुआ। वह शुरू से ही गंभीर, विवेकशील और निश्छल स्वभाव के थे। उन्हें राजनीतिक दाँवपेंच से घृणा थी। वह पेशवा राजनीति के दाँवपेंच से तंग आकर सन् 1804 में पूना छोड़कर बनारस आ गये और सन् 1808 में हाथरस में आकर रहने लगे। उक्त संदर्भो से निम्नलिखित तथ्य सामने आते हैं, जो काफ़ी विश्वसनीय प्रतीत होते हैं: 1. तुलसी साहिब ऊँचे घराने से संबंध रखते थे और पेशवा वंश के राज परिवार में से थे।

2. उनका जन्म अठारहवीं शताब्दी के मध्य में हुआ।

3. उनके हृदय में संसार के बजाय परमार्थ की लगन थी।

4. वह अपने शहर से अचानक ग़ायब हो गये। संभव है कि उन्होंने अपना नाम श्याम राव रख लिया हो ताकि उन्हें कोई पहचान न पाये।

5. उन्होंने बहुत दूर-दूर तक भ्रमण किया, परंतु अंत में वह यू.पी. में अलीगढ़ ज़िले के कस्बे, हाथरस में आकर रहने लगे।

6. वह दक्षिण की तरफ़ से आये थे, जिस कारण वे 'दखणी बाबा' के नाम से प्रसिद्ध हुए। स्वरूप

संतदास महेश्वरी ने तुलसी साहिब के स्वरूप के विषय में यह विवरण दिया है: वह लगभग छ: फुट लंबे, गोरे और पतले शरीर के थे। उनके मुख मंडल पर अलौकिक तेज और अद्भुत प्रकाश दिखाई देता था। उनका मस्तक चौड़ा था और नेत्रों में से तेज झलकता था। उनकी लंबी दाढ़ी थी और चेहरा बहुत प्रभावशाली था। शरीर ऐसा था मानो सोना तप रहा हो। वह अपने शरीर को अकसर गुदड़ी या कंबल से ढककर रखते थे। उनके तेजस्वी मुख पर नज़र टिकाये रखना भी मुश्किल था, परंतु इससे ध्यान हटा पाना भी आसान नहीं था। उनके तेजपूर्ण नेत्र हृदय में गहरे उतर जाते थे और वहाँ अपना स्थायी ठिकाना बना लेते थे।


उनकी रचना घट रामायण के आरंभ में उनके जीवन के संबंध में यह जानकारी मिलती है कि उनका जन्म सन् 1763 में हुआ और 80 वर्ष की आयु पूरी करके 1843 ई. में वे परलोक सिधार गये।


Saint Tulsi Saheb

 

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