आत्मा/Atma

सन्तजन उपदेश देते हैं कि मनुष्य की हस्ती यानी अस्तित्व का आधार मन-इन्द्रियाँ यानी शरीर नहीं, आत्मा/Atma है। मन-इन्द्रियाँ जड़ और नाशवान् हैं, पर आत्मा उस कर्तापुरुष का अंश होने के कारण उसकी तरह ही चेतन, अमर, अविनाशी और अजन्मा है। असल में आत्मा/Atma, परमात्मा की तरह शक्ति-रूप, ज्ञान-रूप और आनन्द-रूप है। इसे न तलवार काट सकती है, न आग जला सकती है और न ही पानी गला सकता है (गीता 2:23-24)। यह इस नश्वर संसार की रहनेवाली नहीं है। यह असल में सहज आनन्द और पूर्ण ज्ञान के अजर और अमर धाम सतलोक की रहनेवाली है। यह स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढ़े, काले-गोरे, हिन्दू-मुसलमान, अमरीकन-अफ्रीकन के भेद-भाव से ऊपर है।

जिस प्रकार ठण्डे देश के निवासी को उस देश के वातावरण के अनुसार और अन्तरिक्ष में जानेवाले यात्री को अन्तरिक्ष के वातावरण के अनुसार कपड़े पहनने पड़ते हैं, उसी तरह, न आत्मा अपने विशुद्ध स्वरूप में इस मायावी जगत मे रह सकती है और न ही यह जगत् निर्मल आत्मा/Atma के प्रकाश और तेज को सहन कर सकता है। इसलिये आत्मा को काल और माया के इस संसार में रहने के लिये अपने ऊपर मायावी पर्दे डालने पड़ते हैं।

वर्तमान अवस्था में आत्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार के पर्दो (शरीरों) में लिपटी हुई है और इन तीनों में स्थूल (पिण्डी), सूक्ष्म (अण्डी) और कारण (ब्रह्मण्डी) मन काम कर रहा है। जब तक आत्मा/Atma मन और इन्द्रियों का साथ नहीं लेती, यह पूर्ण रूप से शुद्ध आत्मा/Atma है। परन्तु जब मन और इन्द्रियों का साथ ले लेती है, तो यह जीवात्मा कहलाती है।


वर्तमान अवस्था में जीव, मन और आत्मा/Atma का मेल है। शरीर रथ के समान है, मन घोड़ों की तरह है और आत्मा रथवान है। शरीर जड़ है। यह चेतन आत्मा के कार्यशील होने का साधन है। मन, जड़ शरीर और चेतन आत्मा को आपस में जोड़ने वाली कड़ी है। मन का असल घर दूसरा रूहानी मण्डल त्रिकुटी है। शरीर और मन की कोई आज़ाद हस्ती या अस्तित्व नहीं, जब कि आत्मा रूपी रथवान की रथ और घोड़ों से अलग भी हस्ती है। आत्मा को सिर्फ मायावी संसार में रहने के लिये मन-इन्द्रियों या शरीर की ज़रूरत है। पवित्र रूहानी जगत् सतलोक में इसे किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ता। मन-इन्द्रियाँ जड़ हैं। ये आत्मा/Atma से प्रकाश या शक्ति लेकर काम करते हैं, पर धीरे-धीरे ये आत्मा पर हावी हो जाते हैं और आत्मा के हुक्म में चलने की बजाय आत्मा को अपने वश में कर लेते हैं। नतीजा यह होता है कि आत्मा नाशवान् संसार के भोगों की तरफ खिंची चली जाती है और इनकी प्राप्ति के लिये इन्द्रियों के घाट पर उतरकर कर्म करती है। जिस तरह शतरंज के खेल में पहली चाल चलने की आजादी होती है, पर आगे की हर चाल पर इससे पहले चली गई सभी चालों का असर होता है, उसी तरह जब आत्मा/Atma सतलोक से मृत्युलोक में उतरी तो इसने कोई कर्म नहीं किया था। इसका पहला कर्म स्वतन्त्र था, दूसरे कर्म पर पहले का और इसी तरह अगले कर्मों पर पहले किये गए सब कर्मों का प्रभाव पड़ता गया। धीरे-धीरे अनेक कर्मों का एक बहुत बड़ा ढेर इकट्ठा हो गया, जिसने इसके प्रकाश को ढक लिया। इसका प्रत्येक कर्म एक साफ़ शीशे पर पड़ने वाले मिट्टी के कण के समान होता है। धीरे-धीरे सारे शीशे को धूल ढक लेती है और शीशा मिट्टी का रूप बन जाता है। यही दशा वर्तमान अवस्था में हमारी आत्मा की है। इसका क़ुदरती प्रकाश किये हुए कर्मों के कारण इस क़दर ढक गया है कि न इसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान है, न अपने वास्तविक स्रोत सतपुरुष का और न ही अपने निज-देश सतलोक का।


सन्त-महात्मा जीव को अज्ञानता की नींद से जगाते हैं। वे समझाते हैं कि यह देश तेरा देश नहीं, यह धर्म तेरा धर्म नहीं। तेरा असल देश सचखण्ड है, तेरा असल धर्म परमात्मा का प्रेम है। तेरा निज-स्वरूप मन और इन्द्रियाँ नहीं। तू चेतन है। इन्द्रियों के भोग सच्चे सुख के साधन नहीं हैं। ये तुझे काल और माया द्वारा निज-घर के परम सुख से दूर रखने के लिये बुना गया जाल है। सन्त-महात्मा जीव को अपने असल या वास्तविक स्वरूप और असल स्रोत की पहचान का सन्देश देते हैं। अपने असल स्वरूप की पहचान का अर्थ है, मन को इन्द्रियों से अलग करना और असल स्रोत की पहचान से भाव है कि मन और इन्द्रियों यानी शरीर के बन्धन से आजाद हुई आत्मा/Atma को परमात्मा में लीन करना। अपने असल स्रोत और असल स्वरूप की पहचान का कार्य पूरे सन्त-सतगुरु की बताई गई युक्ति के अनुसार नाम या शब्द के अभ्यास द्वारा पूरा होता है। इस अभ्यास के तीन अंग हैं – सिमरन, ध्यान और शब्द-धुन। सिमरन द्वारा मन और आत्मा /Atma की शरीर के रोम-रोम में रमी हुई धाराएँ आँखों के पीछे एकाग्र हो जाती हैं। सतगुरु के स्वरूप के ध्यान द्वारा आँखों के पीछे एकाग्र हुए मन और आत्मा वहाँ स्थिर हो जाते हैं, जिससे आत्मा को अन्दर अनहद शब्द की ध्वनि सुनाई देने लगती है और शब्द का प्रकाश दिखाई देना शुरू हो जाता है। इस ध्वनि और प्रकाश के सहारे आत्मा का आन्तरिक रूहानी सफ़र शुरू हो जाता है। जब आत्मा शरीर के आँखों से निचले भाग में से सिमटकर आँखों के पीछे एकाग्र हो जाती है तो मन और आत्मा, शरीर और इन्द्रियों के बन्धन से आजाद हो जाते हैं। जब शब्द के सहारे मन और आत्मा अन्दर दूसरे रूहानी मण्डल, त्रिकुटी में पहुँचते हैं तो मन इस मण्डल में लीन हो जाता है और आत्मा/Atma इसके पंजे से आज़ाद होकर तीसरे रूहानी मण्डल, दसम द्वार में पहुँच जाती है। इस अवस्था को ही जड़ और चेतन की गाँठ खुलने, अपने निज-स्वरूप की पहचान होने या आत्मा द्वारा मन को जीत लेने की अवस्था कहा गया है। इसके बाद आत्मा शब्द के सहारे अपने निज-घर सचखण्ड वापस पहुँच जाती है, जहाँ से यह सृष्टि के आदि में उतरी थी। इसे असल स्रोत की पहचान या परमात्मा की पहचान का नाम दिया गया है। संसार की सम्पूर्ण रूहानियत इस सिद्धान्त पर खड़ी है कि मनुष्य की हस्ती का आधार आत्मा/Atma है और आत्मा/Atma को मन-इन्द्रियों से अलग करके परमात्मा से जोड़ना चाहिये। यही सच्चे और स्थाई परम आनन्द का असल स्रोत है और यही मन-इन्द्रियों की कैद में फँसी आत्मा/Atma का एकमात्र सच्चा उद्देश्य है।

 

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