सतगुरु

सतगुरू पद के लक्षण

सतगुरु पद के लक्षण इन लक्षणों से भाव ऐसे प्रमाणों से है जिन्हें कोई भी देख और समझ सके । सतगुरु के विषय में जो कुछ कहा गया है, उसके अलावा और भी कई प्रभावशाली लक्षण हैं जो एक सच्चे सतगुरु को ढोंगी गुरु से अलग करते हैं । इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

(1) अत्यंत ध्यान देने योग्य बात यह है कि सच्चे सतगुरु जीव की जो भी सेवा- सहायता करते हैं, उसके बदले में कोई क़ीमत नहीं लेते। वे किसी भी रूप में धन स्वीकार नहीं करते और न ही अपने उपदेश के बदले कोई सांसारिक वस्तु लेते हैं। सतगुरु का यह विश्वव्यापी नियम है। परंतु हैरानी की बात है कि अमरीका और अन्य स्थानों पर हज़ारों लोग 'आध्यात्मिक उपदेश' के लिये बहुत-सा धन दे रहे हैं । सतगुरु हमेशा आत्मनिर्भर होते हैं। वे कभी अपने शिष्यों या जनता के दान पर निर्भर नहीं होते।

(2) सतगुरु कभी अपने सतगुरु पद या आध्यात्मिक शक्ति और उपलब्धियों का बखान नहीं करते। यदि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक विकास में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने का दावा करता है, तो उसका यह दावा ही इसका पक्का सबूत है कि उसने कुछ प्राप्त नहीं किया। सतगुरु अत्यंत विनम्र होते हैं, परंतु अपनी विनम्रता का प्रदर्शन कभी नहीं करते और न ही लोगों का ध्यान खींचने के लिये इसका दिखावा करते हैं।

(3) सतगुरु किसी के व्यवहार की शिकायत कभी नहीं करते। यहाँ तक कि यदि हम उन्हें बुरा-भला कहें, तो भी वे कभी गुस्से में आकर उत्तर नहीं देते और न ही बाद में कभी कुछ कहते हैं। वे न कभी अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों की चर्चा करते हैं और न ही उन लोगों की बात करते हैं जो किये गये उपकार के लिये कृतज्ञ नहीं हैं।

(4) चाहे कितनी ही भड़कानेवाली बात क्यों न हो, सतगुरु कभी किसी के सामने या पीठ पीछे दोष नहीं निकालते और न ही किसी को दोषी ठहराते हैं। वे कभी किसी को अपशब्द नहीं कहते, न ही कभी किसी को उनकी कमजोरियों के बारे में बताते हैं। अवगुणों केविषय में मौन रहते हुए वे अच्छे गुणों को बढ़ावा देते हैं। अवगुणों का ज़िक्र केवल प्रश्नों का उत्तर देते हुए या कोई ज़रूरी चेतावनी देते समय करते हैं।

(5) सतगुरु कभी किसी को सज़ा नहीं देते, यहाँ तक कि अपने घोर शत्रुओं या जिन्होंने उनके साथ दुर्व्यवहार किया हो, उन्हें भी नहीं। वे बुराई करनेवालों को सज़ा देने का काम काल पर छोड़ देते हैं जिसका कार्य न्याय करना है। उनका जीवन प्रेम के नियमों पर आधारित है। वे बिना कुछ माँगे उसी प्रकार सभी को अपना प्रकाश तथा प्रेम देते हैं जिस प्रकार सूर्य अपना प्रकाश तथा गरमी सबको एक समान देता है।

(6) सतगुरु कभी हठयोग की क्रियाओं का समर्थन नहीं करते। यह एक विशेष बात है जो उन्हें योगियों से अलग करती है। वे इस बात पर बल देते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना चाहिये। उनके अनुसार शरीर को साफ़-सुथरा, स्वस्थ तथा बलवान् रखना हमारा कर्तव्य है। वे न बहुत अधिक खाना उचित समझते हैं और न ही किसी ऐसी खाने-पीनेवाली वस्तु के प्रयोग की आज्ञा देते हैं जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छी न हो। वे कहते हैं कि थोड़ी देर के आनंद के लिये शरीर को विषय-भोगों का साधन नहीं बनाना चाहिये। यदि कोई अपने शरीर को स्वयं कष्ट दे रहा है या विषय-भोगों में लीन है, तो वह सतगुरु नहीं हो सकता। कुछ योगी शरीर को कष्ट देकर मन पर नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं, परंतु यह एक व्यर्थ प्रयास है। मन को इस प्रकार कभी वश में नहीं किया जा सकता।

(7) सतगुरु अपनी जीविका के लिये कभी हाथ नहीं फैलाते। वे हमेशा आत्मनिर्भर होते हैं । सतगुरु सदैव दाता होते हैं, याचक कभी नहीं। वे अपने शिष्यों को बेकार बैठने और भीख माँगकर जीविका चलाने की आज्ञा नहीं देते। इसलिये जब हम किसी को अपनी जीविका के लिये भीख माँगते या अपनी आध्यात्मिक शिक्षा के लिये धन लेते हुए देखें, तो हमें समझ लेना चाहिये कि वह सतगुरु नहीं है; यहाँ तक कि वह किसी सतगुरु का शिष्य भी नहीं हो सकता। गुरु नानक साहिब कहते हैं: 'जो ईमानदारी से जीविका कमाता है और उसमें से कुछ दान में भी देता है, वह सच्चे मार्ग का ज्ञान प्राप्त करता है।'

(8) सच्चे सतगुरु चमत्कार द्वारा लोगों का ध्यान आकर्षित नहीं करते। वे किसी विशेष कारण से चमत्कार कर सकते हैं, परंतु इसे लोगों से गुप्त रखा जाता है। सच्चे संतों का यह अटल नियम है कि वे शिष्य इकट्ठे करने के लिये कभी चमत्कार नहीं करते। योगी प्रायः चमत्कार करते हैं, जैसे बीमारों को ठीक करना, परंतु सच्चे सतगुरु कभी ऐसा नहीं करते, सिवा किसी विशेष अवसर पर और किसी बेहद ज़रूरी कारण से।

(9) सभी सतगुरु शब्द-धुन का उपदेश देते हैं और इसी का अभ्यास करते हैं। शब्द-धुन ही उनके सत्संगों और अभ्यास की विधि का सारांश भी है। यह शब्द-धुन संपूर्ण सृष्टि का आधार है। यह सतगुरु के जीवन का, उनकी दिनचर्या का मुख्य अंग है। यही वह उच्चकोटि का सार है जिसके बारे में सतगुरु हर समय बात करते हैं। यदि कोई व्यक्ति शब्द-धुन का प्रचार और अभ्यास करता है, तो यह उसके सतगुरु हो सकता है, परंतु इस सबूत को ही अंतिम नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति न इसका प्रचार करता है, न अभ्यास और न ही अपने प्रवचनों में इसका वर्णन करता है, तो यही एकमात्र पक्का सबूत है कि वह सतगुरु नहीं है। शब्द अभ्यास सभी संतों का विश्वव्यापी उपदेश होता है। जो लोग सतगुरु होने का ढोंग करते हैं या जो विधियाँ हमें उच्च मंडलों के मार्गदर्शन का विश्वास दिलाती हैं, उन सब के लिये शब्द-धुन मुख्य कसौटी समझें। यदि शब्द-धुन उनकी पद्धति का सार नहीं है, तो समझें उनके पास कोई रूहानियत नहीं है।

(10) यदि कोई योगी या कोई अन्य व्यक्ति जो सतगुरु होने का दावा करता है, यह उपदेश देता है कि ब्रह्मलोक आध्यात्मिक लोकों में सबसे ऊँचा लोक है और ब्रह्म ही परम ईश्वर है, तो आप निश्चित रूप से जान लें कि वह सतगुरु नहीं है । क्योंकि ब्रह्मलोक यानी त्रिकुटी आंतरिक मंडलों में केवल दूसरा मंडल है, जब कि ऊपर की ओर बढ़ते हुए इस लोक से ऊपर छ: मंडल और हैं। हर ऊपरी लोक नीचेवाले लोक से उच्च और विशाल है। ब्रह्मांड की इस व्यवस्था में ब्रह्म त्रिकुटी का शासक है और तीन लोकों का स्वामी। वह परमसत्ता के अधीन एक कार्यकर्ता है। यहाँ सतगुरु के कुछ प्रमुख लक्षण ही बताये गये हैं। इनके अतिरिक्त और भी बहुत-से लक्षण हैं। इन लक्षणों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने से आप ढोंगी गुरुओं के धोखे से बच सकते हैं । सतगुरु होने का दावा कर रहे किसी व्यक्ति का यदि आप कुछ समय के लिये ध्यान से निरीक्षण करें, तो आपको कहीं न कहीं अवश्य पता लग जाएगा कि वह ढोंगी है या नहीं।



 

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