भगवान ?

Updated: Jul 28

एक बार राजा ने अचानक एक ब्राह्मण से तीन प्रश्न पूछे।

१) भगवान कहाँ रहता है?

२) भगवान को कैसे खोजें?

३) भगवान क्या करता है?


अचानक इस सवाल को सुनकर ब्राह्मण भ्रमित हो गया और बोला, "मैं कल इन सवालों के जवाब सोचकर दूंगा l

जब ब्राह्मण घर पहुंचा, तो वह बहुत दुखी था। उस दुःख को देखकर, उनके बेटे ने पूछा होगा तो ब्राह्मण ने कहा, “बेटा, आज महाराज ने मुझसे एक ही बार में तीन सवाल पूछे हैं। मुझे उसके जवाब नहीं पता और मैं कल उसके जवाब देना चाहता हूं।

ब्राह्मण के बेटे ने कहा, "पिता जी, मुझे कल महाराज के दरबार ले जाइए, मैं महाराजा को जवाब दूंगा।" बालहठ को देखकर, ब्राह्मण उसे अगले दिन दरबार में ले गया।

ब्राह्मण को देखकर महाराज ने कहा, "कल पूछे गए मेरे प्रश्नों का उत्तर दो।"

ब्राह्मण ने कहा, "महाराज, मेरा बेटा आपके सवालों का जवाब देगा।"


महाराज ने लड़के से पहला सवाल पूछा, "बताओ, भगवान कहाँ रहते हैं ?"

लड़के ने निवेदन किया, "महाराज, मुझे एक गिलास दूध और चीनी लाकर दो।" दूध लाने के बाद, लड़के ने महाराज से पूछा कि दूध कैसा है। महाराज ने दूध का स्वाद चखा और कहा कि यह मीठा है।

लेकिन महाराज, क्या यह चीनी जैसा दिखता है? महाराज ने कहा कि नहीं क्योंकि यह दूध में घुला हुआ है। यह सही है, महाराज!

इसी तरह, भगवान दुनिया में हर जगह है, लेकिन जैसे दूध में चीनी घुल जाती है, वैसे ही भगवान हर जगह है और वह दिखाई नहीं देता।

महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक कहा कि मुझे बताओ कि भगवान को कैसे प्राप्त किया जाए ?

लड़के ने कहा

“महाराज, क्या आप कुछ दही लाने का हुकूम देंगे?” महाराज ने दही का आर्डर दिया।

तब ब्राह्मण पुत्र ने कहा, “महाराज! क्या यह मक्खन की तरह दिखता है?

"महाराज ने कहा," मक्खन इसमें है, लेकिन आप इसे मंथन के बाद ही प्राप्त कर सकते हैं।

"ब्राह्मण पुत्र ने कहा," महाराज भगवान के साथ भी ऐसा ही है। उसके लिए आपको मंथन, साधना और तपस्या करनी होगी l


संत तुकाराम भी अपने अभंग अभंग मे दर्शाते हे,

"मंथुनी नवनीता।

तैसें गे अनंता ।।"

कि जैसे दही के मंथन के बाद हि मक्खन मिलता हे वैसेही अपनी आत्मा और मन के मंथन के बाद हि ईश्वर मिलता है l मन और आत्मा का मंथन यांनी साधना और तपस्या है.


"महाराज खुश हुए और कहा" अब आखिरी सवाल, भगवान क्या करता है ? "

ब्राह्मण पुत्र ने कहा महाराज ! इसके लिए आपको मुझे गुरु के रूप में स्वीकार करना होगा।

”महाराज ने कहा -“ ठीक है, तुम गुरु हो और मैं तुम्हारा शिष्य हूँ।

”पुत्र ने कहा -“ महाराज गुरु सिंहासन पर विराजमान हैं और शिष्य नीचे बैठता है। पुत्र स्वयं सिंहासन पर बैठा और बोला, "यह आपके अंतिम प्रश्न का उत्तर है।

महाराज ने कहा," इसका क्या मतलब है? " मुझे समझ नहीं आता "।

बालक ने कहा- “महाराज! यह वही है जो भगवान करता है, यदि वह निर्णय लेता है, तो वह राजा को एक क्षण में रंक और रंक को राजा करा देगा।


यदि आप "दुखी" होना चाहते हैं, तो हर चीज में दोष ढूंढो, तथा "खुश" रहना है, तो सभी में "गुण" ढूंढो!


"विचारों को पढ़कर बदलाव नहीं आता l

केवल विचारों पर चलने से परिवर्तन आता है ...

एक व्यक्ति के रूप में रहने के बजाए,एक "व्यक्तित्व" के रूप में जिएं!

क्योंकि, व्यक्ति किसी बिंदु पर समाप्त होता है, लेकिन व्यक्तित्व हमेशा जीवित रहता है l "



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